I love to write poetry. I am trying my best but your suggestions are required.So please stay with me.
NAMAN
SMILE
Thursday, 10 December 2015
Wednesday, 9 December 2015
Tuesday, 8 December 2015
Tuesday, 9 June 2015
NYAY KI AS LEKAR
न्याय की आस लेकर वो घूम रहे थे
वो रकम थी मोटी जिसने सच छिपा दिया
पैसा नही है सबकुछ वो ये समझते थे
पर पैसा ही है सबकुछ उनको बता दिया
पूरी लगन से वो हुनर अपना दिखाते हैं
पल में उन्होंने सच को झूठ से सजा दिया
वो घर सुकूं से सोने का सपना सजाये थे
एक काल ने साहिब की घर ऑफिस बना दिया
तिकड़म जुगाड़बाजी चापलूसी और अदा
उनके इन्ही गुणों ने उन्हें सब दिला दिया
SAVE US
शालिनी शर्मा
वो रकम थी मोटी जिसने सच छिपा दिया
पैसा नही है सबकुछ वो ये समझते थे
पर पैसा ही है सबकुछ उनको बता दिया
पूरी लगन से वो हुनर अपना दिखाते हैं
पल में उन्होंने सच को झूठ से सजा दिया
वो घर सुकूं से सोने का सपना सजाये थे
एक काल ने साहिब की घर ऑफिस बना दिया
तिकड़म जुगाड़बाजी चापलूसी और अदा
उनके इन्ही गुणों ने उन्हें सब दिला दिया
SAVE US
शालिनी शर्मा
Sunday, 7 June 2015
DESTINY
है कोन जो बर्बादी का इन्तजाम कर रहा है
खुद बैल उसे मारे ऐसा काम कर रहा है
अपना सुकूँ और चैन खुद हराम हराम कर रहा है
खुद घिर के आग में ,हवा बदनाम कर रहा है
जो था खिलाडी नांदा ,वो आराम कर रहा है
महनत से खेला जो वो जग में नाम कर रहा है
ये भाग्य है जो जीतना नाकाम कर रहा है
बाजी पलट वो उसका घर नीलाम कर रहा है
खुद बैल उसे मारे ऐसा काम कर रहा है
अपना सुकूँ और चैन खुद हराम हराम कर रहा है
खुद घिर के आग में ,हवा बदनाम कर रहा है
जो था खिलाडी नांदा ,वो आराम कर रहा है
महनत से खेला जो वो जग में नाम कर रहा है
ये भाग्य है जो जीतना नाकाम कर रहा है
बाजी पलट वो उसका घर नीलाम कर रहा है
अन्तर
जो तेरे पास है मुझे वो मिल नही सकता
जो मेरे पास है वो तुझसे झिल नही सकता
मिला उपहार में सोने का एक पालना तुझको
जिसमे दासी ने हमेशा तुझे झूला झुलाया है
मगर मुझको मेरी माँ ने डाल के कपड़े का झूला
लोरियाँ दे के एक पेड़ के नीचे सुलाया है
सिले हैं ऐसे मोती के कोई भी हिल नहीं सकता
छेड़ इतने मेरे झूले में कोई सिल नहीं सकता
जो -----------------------
बना के नये नये व्यंजन सजा दिये तेरे लिये
पलंग भी गद्देदार है ,खुशबूदार है तेरा
मुझे भर पेट रोटियां मिले कभी कभी यंहा
और सोने को फुटपाथ ,ये नसीब है मेरा
कैसे कहूं तू फूल वो जो खिल नहीं सकता
कैसे कहूं मैं घाव वो जो छिल नहीं सकता
जो ------------------------
शालिनी शर्मा
जो तेरे पास है मुझे वो मिल नही सकता
जो मेरे पास है वो तुझसे झिल नही सकता
मिला उपहार में सोने का एक पालना तुझको
जिसमे दासी ने हमेशा तुझे झूला झुलाया है
मगर मुझको मेरी माँ ने डाल के कपड़े का झूला
लोरियाँ दे के एक पेड़ के नीचे सुलाया है
सिले हैं ऐसे मोती के कोई भी हिल नहीं सकता
छेड़ इतने मेरे झूले में कोई सिल नहीं सकता
जो -----------------------
बना के नये नये व्यंजन सजा दिये तेरे लिये
पलंग भी गद्देदार है ,खुशबूदार है तेरा
मुझे भर पेट रोटियां मिले कभी कभी यंहा
और सोने को फुटपाथ ,ये नसीब है मेरा
कैसे कहूं तू फूल वो जो खिल नहीं सकता
कैसे कहूं मैं घाव वो जो छिल नहीं सकता
जो ------------------------
शालिनी शर्मा
Friday, 22 May 2015
chhand
कंहा थे मगर अब कँहा आ गये हैं हम
सारी चीजे अच्छी अच्छी छोड़ छोड़ के
सुख ,चैन ,शान्ति ,आराम सब गंवा दिया
हमने पश्चिम के पीछे दौड़ दौड़ के
शालिनी शर्मा
सारी चीजे अच्छी अच्छी छोड़ छोड़ के
सुख ,चैन ,शान्ति ,आराम सब गंवा दिया
हमने पश्चिम के पीछे दौड़ दौड़ के
शालिनी शर्मा
Friday, 15 May 2015
lahu na bahe vyarth
पत्थर दिल भी विस्फोटो से
पिघल पिघल रह जाता है
निर्दोषो का लहू सभी को
प्रश्नचिन्ह दे जाता है
एक आग बुझने ना पाये
घर दूजा जल जाता है
बड़ो का हो या बच्चो का
शव तो शव कहलाता है
शालिनी शर्मा
पिघल पिघल रह जाता है
निर्दोषो का लहू सभी को
प्रश्नचिन्ह दे जाता है
एक आग बुझने ना पाये
घर दूजा जल जाता है
बड़ो का हो या बच्चो का
शव तो शव कहलाता है
शालिनी शर्मा
Friday, 8 May 2015
Thursday, 7 May 2015
Wednesday, 6 May 2015
Suvicha
छल, झूठ ,कपट, अन्याय यंहा
मानवता की सिसकारी है
धरती है लहूलुहान यँहा
अम्बर बटने की बारी है
ये तेरा है ,ये मेरा है
चंहु ओर ही मारामारी है
हर तरफ है लूट खसोट यंहा
संकट में दुनिया सारी है
हर तरफ भूख है ,तृष्णा है
नहीं ये संस्कृति हमारी है
आदर्शो की उच्च विरासत के
हम तो अधिकारी हैं
कंही गुम हो गया हमारा भारत
ढूंढे उसे सजाये हम
सदाचार ,अपनत्व ,प्रेम की
माला नई बनाये हम
गौरवशाली इतिहास हमारा
त्याग हमें सिखलाता है
गांधी ,और राम लखन का स्मरण
सही मार्ग दिखलाता है
श्री राम ने सन्तोषी बन के
सुख, सुविधाओं का त्याग किया
गाँधी जी ने भी परोपकार में
अपना जीवन त्याग दिया
सही आचरण बच्चो को
सिखलाना बहुत जरुरी है
बिन त्याग और संघर्ष ,समर्पण के
शिक्षाएं अधूरी है
शालिनी शर्मा
मानवता की सिसकारी है
धरती है लहूलुहान यँहा
अम्बर बटने की बारी है
ये तेरा है ,ये मेरा है
चंहु ओर ही मारामारी है
हर तरफ है लूट खसोट यंहा
संकट में दुनिया सारी है
हर तरफ भूख है ,तृष्णा है
नहीं ये संस्कृति हमारी है
आदर्शो की उच्च विरासत के
हम तो अधिकारी हैं
कंही गुम हो गया हमारा भारत
ढूंढे उसे सजाये हम
सदाचार ,अपनत्व ,प्रेम की
माला नई बनाये हम
गौरवशाली इतिहास हमारा
त्याग हमें सिखलाता है
गांधी ,और राम लखन का स्मरण
सही मार्ग दिखलाता है
श्री राम ने सन्तोषी बन के
सुख, सुविधाओं का त्याग किया
गाँधी जी ने भी परोपकार में
अपना जीवन त्याग दिया
सही आचरण बच्चो को
सिखलाना बहुत जरुरी है
बिन त्याग और संघर्ष ,समर्पण के
शिक्षाएं अधूरी है
शालिनी शर्मा
Tuesday, 5 May 2015
GAJAL mhfil se hta
महफ़िल से हटा उसको वो महफ़िल पे छा गया
उसका हुनर दिखा के वाह वाही पा गया
दुश्मन से सावधान था वो हर जगह मगर
वो दोस्त था जीवन में जिससे धोखा खा गया
जीवन में नहीं होता सारा कुछ सही सही
उसका भी बुरा वक्त अब जीवन में आ गया
कहते हैं ठोकरों से लोग गिर के सम्भलते
उसको भी खा के ठोकरे सम्भलना आ गया
फितरत नहीं थी उसकी किसी से करे गिला
वो हसं के दगाबाजी को उसकी भुला गया
शालिनी शर्मा
उसका हुनर दिखा के वाह वाही पा गया
दुश्मन से सावधान था वो हर जगह मगर
वो दोस्त था जीवन में जिससे धोखा खा गया
जीवन में नहीं होता सारा कुछ सही सही
उसका भी बुरा वक्त अब जीवन में आ गया
कहते हैं ठोकरों से लोग गिर के सम्भलते
उसको भी खा के ठोकरे सम्भलना आ गया
फितरत नहीं थी उसकी किसी से करे गिला
वो हसं के दगाबाजी को उसकी भुला गया
शालिनी शर्मा
Tuesday, 7 April 2015
PODHE LAGAO
वृक्षों को उगा के कर धरती का श्रंगार
पोधे मित्र हमारे हैं जीवन का आधार
जंगल कटेंगे होगी ताप में वृद्धि
ग्लेशियर पिघल कर देंगे जल में भी वृद्धि
मौसम में परिवर्तन भी होगा लगातार
पोधे- - - - - - - - - - - - - --
ग्लोबल वार्मिंग की ये समस्या
co2 के कारण है ये समस्या
सोचो co2 का अब ना होवे विस्तार
पोधे - - - - - - - - - - - - - -
रोग मिटाये ,करते ईंधन की पूर्ति
आक्सीजन ताजी देती स्फूर्ति
पोधो से होता है पर्यावरण में सुधार
पोधे - - - - - - - - - - - - - -
शालिनी शर्मा
पोधे मित्र हमारे हैं जीवन का आधार
जंगल कटेंगे होगी ताप में वृद्धि
ग्लेशियर पिघल कर देंगे जल में भी वृद्धि
मौसम में परिवर्तन भी होगा लगातार
पोधे- - - - - - - - - - - - - --
ग्लोबल वार्मिंग की ये समस्या
co2 के कारण है ये समस्या
सोचो co2 का अब ना होवे विस्तार
पोधे - - - - - - - - - - - - - -
रोग मिटाये ,करते ईंधन की पूर्ति
आक्सीजन ताजी देती स्फूर्ति
पोधो से होता है पर्यावरण में सुधार
पोधे - - - - - - - - - - - - - -
शालिनी शर्मा
Monday, 6 April 2015
जाते हुए जँहा से उसने मुझे पुकारा
थमती हुई नजर से आँख खोल के निहारा
हांथो में हाथ लेके मैंने दिया सहारा
पर धीमी होती नब्ज का कुछ और था इशारा
उम्मीद की किरण ना थी गमगीन था नजारा
सांसो की डोर उसकी टूटी जो था हमको प्यारा
ईश्वर के हाथ में है जीवन मरण हमारा
नश्वर शरीर है यहां पे कुछ नहीं तुम्हारा
शालिनी शर्मा
थमती हुई नजर से आँख खोल के निहारा
हांथो में हाथ लेके मैंने दिया सहारा
पर धीमी होती नब्ज का कुछ और था इशारा
उम्मीद की किरण ना थी गमगीन था नजारा
सांसो की डोर उसकी टूटी जो था हमको प्यारा
ईश्वर के हाथ में है जीवन मरण हमारा
नश्वर शरीर है यहां पे कुछ नहीं तुम्हारा
शालिनी शर्मा
Sunday, 5 April 2015
MUJHE BACHAO
प्रकृति
अब कहां हूँ मैं ,मैं कहीं नही , मुझे नही कभी पहचाना है
मुझे देखो मैं हूँ लुटी प्रकृति ,जिसको तुम्हे बचाना है
दुनिया का अजब दस्तूर यहाँ उगते सूरज का जमाना है
मैं ढलती हुई एक शाम हर कोई क्यों मुझसे बेगाना है
मेरा दिल संरक्षित वन जैसा ,वर्जित शिकारी का आना है
माली बन कर आओ जो तुमको मेरे दिल में आना है
झरनो की है चंचलता मुझमे ,हिरणो सा मेरा इठलाना है
नदियों सा है निर्मल तन मेरा ,कोयल का गीत मेरा गाना है
मुझमे चन्दन की महक काम मेरा सुगंध फैलाना है
मैं चिड़ियों की हूँ चहक परिंदो सा मेरा चहचहाना है
मैं तितली की मस्ती हूँ मुझको ,फूलों पर मंडराना है
मैं मधुमक्खी की बस्ती हूँ, मुझे मीठा शहद बनाना है
मैं मोर बादलों संग मगन, मेरा काम नाच दिखलाना है
मैं बदली हूँ छायी हूँ गगन, मौसम का रंग मस्ताना है
फूलों की ही कोमलता से नहीं इस बगिया को महकना है
कैक्टस, गुलाब के काँटों को भी खुश होकर अपनाना है
आयी जुलाई बीता है जून बस मानसून को आना है
वर्षा की फुंहारों का जूनून धरती की प्यास बुझाना है
सूरत देखी तूने मेरी, सीरत से मेरी अंजाना है
मैं जंगली फूल सही,, पर भवँरा मेरा भी दीवाना है
मैं हरियाली की चादर हूँ ,मुझे धरा को स्वर्ग बनाना है
वृक्ष उगा के जगह जगह अब इस धरती को बचाना है
शालिनी शर्मा
अब कहां हूँ मैं ,मैं कहीं नही , मुझे नही कभी पहचाना है
मुझे देखो मैं हूँ लुटी प्रकृति ,जिसको तुम्हे बचाना है
दुनिया का अजब दस्तूर यहाँ उगते सूरज का जमाना है
मैं ढलती हुई एक शाम हर कोई क्यों मुझसे बेगाना है
मेरा दिल संरक्षित वन जैसा ,वर्जित शिकारी का आना है
माली बन कर आओ जो तुमको मेरे दिल में आना है
झरनो की है चंचलता मुझमे ,हिरणो सा मेरा इठलाना है
नदियों सा है निर्मल तन मेरा ,कोयल का गीत मेरा गाना है
मुझमे चन्दन की महक काम मेरा सुगंध फैलाना है
मैं चिड़ियों की हूँ चहक परिंदो सा मेरा चहचहाना है
मैं तितली की मस्ती हूँ मुझको ,फूलों पर मंडराना है
मैं मधुमक्खी की बस्ती हूँ, मुझे मीठा शहद बनाना है
मैं मोर बादलों संग मगन, मेरा काम नाच दिखलाना है
मैं बदली हूँ छायी हूँ गगन, मौसम का रंग मस्ताना है
फूलों की ही कोमलता से नहीं इस बगिया को महकना है
कैक्टस, गुलाब के काँटों को भी खुश होकर अपनाना है
आयी जुलाई बीता है जून बस मानसून को आना है
वर्षा की फुंहारों का जूनून धरती की प्यास बुझाना है
सूरत देखी तूने मेरी, सीरत से मेरी अंजाना है
मैं जंगली फूल सही,, पर भवँरा मेरा भी दीवाना है
मैं हरियाली की चादर हूँ ,मुझे धरा को स्वर्ग बनाना है
वृक्ष उगा के जगह जगह अब इस धरती को बचाना है
शालिनी शर्मा
Wednesday, 1 April 2015
GAJAL MERI NAJAR SE GIR KE
मेरी नजर से गिर के, वो फिर ना उठ सका
ऐसी अना भी क्या ना जो थोड़ा सा झुक सका
उसने मुझे अन्जाने में लूटा घड़ी घड़ी
वाकिफ हुआ जो उससे मैं तब फिर ना लुट सका
मैंने भी दिये जख्म उसे याद जो रहे
मैं ना अकेला जख्मों के फंदो में घुट सका
चलती सड़क पे भीड़ के वो सामने लुटा
उसकी मदद को एक भी बन्दा ना रुक सका
सोहबत बुरी थी मुझमें भी उसका असर हुआ
जितनी थी बुरी लत लगी ना उनसे छुट सका
गर्दिश में मर गया वो भूख से तड़प तड़प
उसके लिये कफ़न का कपड़ा ना जुट सका
शालिनी शर्मा
ऐसी अना भी क्या ना जो थोड़ा सा झुक सका
उसने मुझे अन्जाने में लूटा घड़ी घड़ी
वाकिफ हुआ जो उससे मैं तब फिर ना लुट सका
मैंने भी दिये जख्म उसे याद जो रहे
मैं ना अकेला जख्मों के फंदो में घुट सका
चलती सड़क पे भीड़ के वो सामने लुटा
उसकी मदद को एक भी बन्दा ना रुक सका
सोहबत बुरी थी मुझमें भी उसका असर हुआ
जितनी थी बुरी लत लगी ना उनसे छुट सका
गर्दिश में मर गया वो भूख से तड़प तड़प
उसके लिये कफ़न का कपड़ा ना जुट सका
शालिनी शर्मा
GAGAL muskuraye hue
मुस्कुराये हुए इक जमाना हुआ
तू क्यों इस कदर खुद से इतना खफा है
जो कहता है वो, तू उसे भूल जा
बड़ी तीखी सी जालिम ,ये उसकी जुबां है
नजरो की भाषा को पढ़ नासमझ
उसकी झुकती नजर ने सब कुछ कहा है
गलतफहमियों के भंवर से निकल
दोस्ताने में ना उसके कोई दगा है
तू रिश्तो को कड़वा ना कर नासमझ
उम्र गुजरी है तब एक रिश्ता बना है
कोहरा है, ये धुंध छट जायेगी
तू पूछेगा जब ,बात क्या ,क्या गिला है
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