मुस्कुराये हुए इक जमाना हुआ
तू क्यों इस कदर खुद से इतना खफा है
जो कहता है वो, तू उसे भूल जा
बड़ी तीखी सी जालिम ,ये उसकी जुबां है
नजरो की भाषा को पढ़ नासमझ
उसकी झुकती नजर ने सब कुछ कहा है
गलतफहमियों के भंवर से निकल
दोस्ताने में ना उसके कोई दगा है
तू रिश्तो को कड़वा ना कर नासमझ
उम्र गुजरी है तब एक रिश्ता बना है
कोहरा है, ये धुंध छट जायेगी
तू पूछेगा जब ,बात क्या ,क्या गिला है

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