NAMAN

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SMILE

Tuesday, 7 April 2015

PODHE LAGAO

वृक्षों को उगा के कर धरती का श्रंगार 
पोधे मित्र हमारे हैं जीवन का आधार 
       जंगल  कटेंगे होगी ताप में वृद्धि 
       ग्लेशियर पिघल कर देंगे जल में भी वृद्धि 
       मौसम में परिवर्तन भी होगा लगातार 
पोधे- - - - - - - - - - - - - --
       ग्लोबल वार्मिंग की ये समस्या 
        co2  के कारण है ये समस्या 
       सोचो  co2 का अब ना होवे विस्तार
पोधे - - - - - - - - - - - - - -
       रोग मिटाये ,करते ईंधन की पूर्ति 
       आक्सीजन ताजी देती स्फूर्ति 
       पोधो से होता है पर्यावरण में सुधार 
पोधे - - - - - - - - - - - - - -
                           शालिनी शर्मा  




Monday, 6 April 2015

SHIKHAR KI PROBLEM


उफ़ ये पढ़ाई की सिरदर्दी, चैन नहीं लेने देती 
    टीचर है निर्दयी देखो , नंबर हमको वो  नहीं देती 



जाते हुए जँहा से उसने मुझे पुकारा 
थमती हुई नजर से आँख खोल के निहारा 
हांथो में हाथ लेके मैंने दिया सहारा 
पर धीमी होती नब्ज का कुछ और था इशारा 
उम्मीद की किरण ना थी गमगीन था नजारा 
सांसो की डोर उसकी टूटी जो था हमको प्यारा 
ईश्वर के हाथ में है जीवन मरण हमारा 
नश्वर शरीर है यहां पे कुछ नहीं तुम्हारा 
                                           शालिनी शर्मा 

Sunday, 5 April 2015

MUJHE BACHAO

                                                               प्रकृति
अब कहां हूँ मैं ,मैं कहीं नही , मुझे नही कभी पहचाना है 
मुझे देखो  मैं हूँ लुटी प्रकृति ,जिसको तुम्हे बचाना है 
      दुनिया का अजब दस्तूर यहाँ उगते सूरज का जमाना है 
      मैं ढलती हुई एक शाम हर कोई क्यों मुझसे बेगाना है 
मेरा दिल संरक्षित वन जैसा ,वर्जित शिकारी का आना है 
माली बन कर आओ जो तुमको मेरे दिल में आना है 
     झरनो की है चंचलता मुझमे ,हिरणो सा मेरा इठलाना है 
    नदियों सा है निर्मल तन मेरा ,कोयल का गीत मेरा गाना है 
मुझमे चन्दन की महक काम मेरा  सुगंध फैलाना है 
मैं चिड़ियों की  हूँ चहक परिंदो सा मेरा चहचहाना है 
    मैं तितली की मस्ती हूँ मुझको ,फूलों पर मंडराना है 
    मैं मधुमक्खी की बस्ती हूँ, मुझे मीठा शहद बनाना है 
मैं मोर बादलों संग मगन, मेरा काम नाच दिखलाना है 
मैं बदली हूँ छायी हूँ गगन, मौसम का रंग मस्ताना है 
     फूलों की ही कोमलता से नहीं इस बगिया को महकना है 
     कैक्टस, गुलाब के काँटों को भी खुश होकर अपनाना है 
आयी जुलाई बीता है जून बस मानसून को आना है 
वर्षा की फुंहारों का जूनून धरती की प्यास बुझाना है 
    सूरत देखी तूने मेरी, सीरत से मेरी अंजाना है 
    मैं जंगली फूल सही,, पर भवँरा मेरा भी दीवाना है 
मैं हरियाली की चादर हूँ ,मुझे धरा को स्वर्ग बनाना है 
वृक्ष उगा के जगह जगह अब इस धरती को बचाना है 

                                                                शालिनी शर्मा 

Wednesday, 1 April 2015

GAJAL MERI NAJAR SE GIR KE

मेरी नजर से गिर के, वो फिर ना उठ सका
ऐसी अना भी क्या ना जो थोड़ा सा झुक सका 
      उसने मुझे अन्जाने में लूटा घड़ी घड़ी 
      वाकिफ हुआ जो उससे मैं तब फिर ना लुट सका 
मैंने भी दिये जख्म उसे याद जो रहे 
मैं ना अकेला जख्मों के फंदो में घुट सका 
       चलती सड़क पे भीड़ के वो सामने लुटा 
       उसकी  मदद को एक भी बन्दा ना रुक सका 
सोहबत बुरी थी मुझमें भी  उसका  असर हुआ 
जितनी थी बुरी लत लगी ना उनसे छुट सका 
       गर्दिश में मर गया वो भूख से तड़प तड़प 
       उसके लिये कफ़न का कपड़ा ना जुट सका 
                                                शालिनी शर्मा           

GAGAL muskuraye hue

मुस्कुराये हुए इक जमाना हुआ 
तू क्यों इस कदर खुद से इतना खफा है 
जो कहता है वो, तू उसे भूल जा 
बड़ी तीखी सी जालिम ,ये उसकी जुबां है 
      नजरो की भाषा को पढ़ नासमझ 
      उसकी झुकती नजर ने सब कुछ कहा है 
      गलतफहमियों के भंवर से निकल 
      दोस्ताने  में ना उसके कोई दगा है 
तू रिश्तो को कड़वा ना कर नासमझ 
उम्र गुजरी है तब एक रिश्ता बना है 
कोहरा है, ये धुंध छट जायेगी 
तू पूछेगा जब ,बात क्या ,क्या गिला है 
                                        शालिनी शर्मा   
मन से लगा कर किसी की कोई बात मत रखो गलतफहमियां दूरियां और बढ़ाती हैं गिले शिकवे कह सुन कर ही दूर होते हैं बिना बात किये हम कभी कभी बहुत अच्छा साथी खो देते हैं।