NAMAN

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SMILE

Tuesday, 29 March 2016

GAJAL


                       गज़ल

तुमने  कहा रुकने को पर हम  ना रुक सके 
रुसवाइयों का  डर था ,  ना भाव  छुप  सके
            कहना तो चाहते थे    दिल  की  सभी  बातें 
            बन्दिश थी शर्म की ,पर कह  ना कुछ सके 
तुम रूठ  कर गये तो फिर ना लोट के आये 
ऐसी अना भी क्या ना जो थोड़ा सा झुक सके 
            विश्वास तोड़ के मेरा सब कुछ जला दिया 
           मेरी नजर से गिर के वो फिर ना उठ सके 
लावारिसों की मौत मर गया वो इस तरह 
कांधे को चार लोग ना एक साथ जुट सके 
         सोहबत बुरी थी मुझपे भी इसका असर हुआ 
         जितनी थी बुरी लत लगी ना उनसे छुट सके
                                         शालिनी शर्मा  
कृपया उपरोक्त रचना के सन्दर्भ में अपनी प्रतिक्रियायें अवश्य दे आपके कमेन्ट मेरी प्रेरणा है











Sunday, 27 March 2016

MUSHKIL

























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