कारगिल विजय दिवस पर विशेष
विषम और दुर्गम खतरो का भय जहां पर मड़राता है
सर्द,बर्फ वाली रातो में जहां खूं भी जम जाता है
नमन हिन्द की सेना को जो हर खतरा सह जाती है
हर जवान जिसका सकंट में साहस,जोश दिखाता है
शालिनी शर्मा
भारत मां के वीर सपूतो कसम तुम्हे इस माटी की
जब तक खूं में जान रहे रक्षा करना इस घाटी की
शत्रु तुमको बार बार ललकार रहा घर में घुस कर
नाको चने चबा दो ये उम्मीद करे ना माफी की
शालिनी शर्मा
स्व अब्दुल कलाम सर को प्रथम पुन्यतिथी पर नमन
कलाम भी गरीब बच्चो से प्यार करते थे
अन्तर
तेरे घर खुशयों का मेला ,मेरा घर वीरान है
तुझे मिले सम्मान यहां हम सहते बस अपमान है
फुटपाथो पर जीवन जीना कहां यहां आसान है
हमने धरा बिछायी नीचे ,और ओढ़ा आसमान है
जीते जी रोटी को तरसें हम एेसे इन्सान हैं
सभ्य समाज का कूड़ा करकट ,रद्दी का सामान हैं
सुन्दर शहर ये सुन्दर गलियां ,इन पर दाग समान है
दो वर्गो के बीच है खायी,कहां पे एक समान हैं
हम तो इस दुनिया में जैसे बिन बुलाये महमान है
मत दुत्कारो हम भी इस धरती की ही सन्तान हैं
शालिनी शर्मा
तेरे पास दुनिया की दोलत, वो मेरे किस काम की
मेरे लिये तो मेरी झोपड़ी, सौ करोड़ के दाम की
शालिनी शर्मा





