NAMAN

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SMILE

Monday, 20 October 2014

kavita SAMVEDNAO KA MAHAL

                                

संवेदनाओ का महल खंडहर सा हो गया 
    आदमी यंहा पत्थर का हो गया 
                मैं डूब रही थी बचाने ना कोई आया 
           अब ये नजारा खेल के मंजर सा हो गया 
घर मेरा जलता देख हाथ  तापने लगा 
घर उसका भी जल सकता क्यों निडर सा हो गया 
              अच्छी सलाह देना उसने बंद कर दिया 
              नेकी  का पाठ तीर और खंजर सा हो गया 
वो दो कदम भी साथ ना मुश्किल में चल सका 
आसान राह खोज उस डगर का हो गया 
              चमगादड़ों को देख पंछी उलटे लटके हैं 
              उल्टा तरीका अब यहां असर का हो गया 
जब नीर से नयन के विचलित ना वो हुआ 
तो नीर नयन का समुन्दर सा  हो गया
                                         शालिनी शर्मा  
                                    

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