NAMAN

NAMAN
SMILE

Wednesday, 14 February 2018

कविताएँ

फीकी फीकी चाँदनी है आजकल
धुंंध में सिमट गयी रोशनी है आजकल

रिश्ते हैं नाम के गांठे सी पड़ गयी
सुलझा के ड़ोरिया बांधनी है आजकल

मतलब की यारी है है प्यार में दिखावा 
मुंह में दिखावे की चाशनी है आजकल

खुशियां मिले या गम जीना है लाजिमी 
जितनी भी उम्र है काटनी है आजकल

जितनी सिमट सके उतनी समेट लो
 मुस्कान चेहरे पे बांटनी है आजकल

दुश्मन भी दोस्त बन मिलने लगे हैं अब
हो कर सजग ये सूची छांटनी है आजकल
                                    शालिनी शर्मा

नमन वतन पर मरने वालो,नमन देश की शान को
नमन उन्हे जो अडन्न उगाकर जीवन दें इन्सान को
जग में ऊँचा रहे तिरंगा,रहे शान्ति संग हरियाली
हमें बचा कर रखना होगा भारत के स्वाभिमान को
                                             शालिनी शर्मा
मुझमें सब कुछ है साधरण
कुछ भी मुझमें खास नही
चाँद,सितारे दूर गगन में
जुगनू तक भी पास नही
मैं हिरणी मरूथल की मुझमें
अहसासो की प्यास नही
मैं पथरीली बंजर भूमि
हरियाली की आस नही
नाव फंसी जो तूफानो में
कोई किनारा पास नही
पंख कटे पंछी को कोई
उड़ने को आकाश नही
                 शालिनी शर्मा
आह जिस वक्त सर उठाती है
कोई ताकत ना काम आती है

आंहोे में सिसकियों में वो ताकत है
ये ताज भी और तख्त भी हिलाती है

पत्थर भी पिघल जाते है देखा है
बेबस की आँख आँसू जब बहाती है

दिल दुखता तो बहुत है तेरे रोने से मगर
ये वक्त मार की है एेसे ही तो रूलाती है

कुछ बन गये सिकन्दर कुछ खत्म हो गये
घड़ियां तो हर किसी को आजमाती है
                             शालिनी शर्मा
दिल ना मेरा यूं दुखाया कीजिये
बेरूखी कभी तो हटाया कीजिये

हमेशा पत्थर ही मत बने रहिये
मोम से भी पिघल जाया कीजिये

नश्तर चुभा के जख्म दिये बहुत
कभी मरहम भी लगाया कीजिये

परिन्दो के घरोंदे उजाड़े रोज बहुत
कभी आशियाने बसाया कीजिये

झुलसे दरखत धूप से ,सूखने लगे
जल देके दरख्तो को बचाया कीजिये

अपनी सुना दी,अब सुनो बात हमारी
गुस्से से नही प्यार से समझाया कीजिये
                                     शालिनी शर्मा


जो हम है वो तुमने समझा कहाँ
इक दिल भी है हममें समझा कहाँ

कुछ तो वजह थी कि आ ना सके
कुछ मजबूरियाँ थी समझा कहाँ

कटी डालियाँ हैं दरख्तो की ऊँचे
कहाँ छांव मिलती समझा कहाँ

ना चम्पा ना बेला ना केसर कहीं
चमन सारा उजड़ा है समझा कहाँ

आंधी ने सब कुछ तबाह कर दिया
बचा आशियां ना समझा कहाँ

लहर एक आयी थी कश्ती डुबाने
दुख उसने मांझी का समझा कहाँ
                         शालिनी शर्मा

आह जिस वक्त सर उठाती है
कोई ताकत ना काम आती है

आंहोे में सिसकियों में वो ताकत है
ये ताज भी और तख्त भी हिलाती है

पत्थर भी पिघल जाते है देखा है
बेबस की आँख आँसू जब बहाती है

दिल दुखता तो बहुत है तेरे रोने से मगर
ये वक्त मार की है एेसे ही तो रूलाती है

कुछ बन गये सिकन्दर कुछ खत्म हो गये
घड़ियां तो हर किसी को आजमाती है
                             शालिनी शर्मा

नजर से दूर सही दिल के पास रहता है
जगते में सोते में भी मेरे साथ रहता है

मैं भूलना भी चाहूँ तो भी ना भूल पाऊं
मुझको वो हर घड़ी क्यूं याद रहता है

कैसी वो शख्सियत है कैसा जगाता जादू
उसका ही जिक्र उसके भी बाद रहता है

आयेगा कब या ना भी वो आये लोटकर
पर इन्तजार उसका दिन रात रहता है
                            शालिनी शर्मा

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